श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।

उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१

evaṃ jijñāsayāpohya nānātvabhramamātmani|

upārameta virajaṃ mano mayyarpya sarvage|| 21

अर्थ

प्रिय उद्धव! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचारके द्वारा आत्मामें जो अनेकताका भ्रम है उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मामें अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसारके व्यवहारोंसे उपराम हो जाय॥ २१॥

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