श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यस्यां न मे पावनमंग कर्म

स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य ।

लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्

वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्‍न धीरः॥ २०

yasyāṃ na me pāvanamaṃga karma

sthityudbhavaprāṇanirodhamasya |

līlāvatārepsitajanma vā syād

vandhyāṃ giraṃ tāṃ bibhṛyānna dhīraḥ|| 20

अर्थ

इसलिये उद्धव! जिस वाणीमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोकपावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे॥ २०॥✎ 1936

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1936 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): लोक-पावन → लोकपावन

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