इसलिये उद्धव! जिस वाणीमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोकपावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे॥ २०॥✎ 1936
यस्यां न मे पावनमंग कर्म
स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य ।
लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्
वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः॥ २०
इसलिये उद्धव! जिस वाणीमें जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोकपावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.11.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 783) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/11/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1936 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): लोक-पावन → लोकपावन