श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां

देहं पराधीनमसत्प्रजां च।

वित्तं त्वतीर्थीकृतमंग वाचं

हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी॥ १९

gāṃ dugdhadohāmasatīṃ ca bhāryāṃ

dehaṃ parādhīnamasatprajāṃ ca|

vittaṃ tvatīrthīkṛtamaṃga vācaṃ

hīnāṃ mayā rakṣati duḥkhaduḥkhī|| 19

अर्थ

दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणोंसे रहित वाणी व्यर्थ है। इन वस्तुओंकी रखवाली करनेवाला दुःख-पर-दुःख ही भोगता रहता है॥ १९॥✎ 1936

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1936 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): लोक-पावन → लोकपावन

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