॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.10.35
उद्धव उवाच
गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृतः।
गुणैर्न बद्ध्यते देही बद्ध्यते वा कथं विभो॥ ३५
guṇeṣu vartamāno'pi dehajeṣvanapāvṛtaḥ|
guṇairna baddhyate dehī baddhyate vā kathaṃ vibho|| 35
अर्थ
उद्धवजीने पूछा—भगवन्! यह जीव देह आदि रूप गुणोंमें ही रह रहा है। फिर देहसे होनेवाले कर्मों या सुख-दुःख आदि रूप फलोंमें क्यों नहीं बँधता है? अथवा यह आत्मा गुणोंसे निर्लिप्त है, देह आदिके सम्पर्कसे सर्वथा रहित है, फिर इसे बन्धनकी प्राप्ति कैसे होती है?॥ ३५॥