श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

स्त्रीभिः कामगयानेन किंकिणीजालमालिना।

क्रीडन् न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृतः॥ २५

strībhiḥ kāmagayānena kiṃkiṇījālamālinā|

krīḍan na vedātmapātaṃ surākrīḍeṣu nirvṛtaḥ|| 25

अर्थ

उसका विमान वह जहाँ ले जाना चाहता है, वहीं चला जाता है और उसकी घंटियाँ घनघनाकर दिशाओंको गुंजारित करती हैं। वह अप्सराओंके साथ नन्दनवन आदि देवताओंकी विहार-स्थलियोंमें क्रीड़ाएँ करते-करते इतना बेसुध हो जाता है कि उसे इस बातका पता ही नहीं चलता कि अब मेरे पुण्य समाप्त हो जायँगे और मैं यहाँसे ढकेल दिया जाऊँगा॥ २५॥

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