श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तावत् प्रमोदते स्वर्गे यावत् पुण्यं समाप्यते।

क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन् कालचालितः॥ २६

tāvat pramodate svarge yāvat puṇyaṃ samāpyate|

kṣīṇapuṇyaḥ patatyarvāganicchan kālacālitaḥ|| 26

अर्थ

जबतक उसके पुण्य शेष रहते हैं, तबतक वह स्वर्गमें चैनकी वंशी बजाता रहता है; परन्तु पुण्य क्षीण होते ही इच्छा न रहनेपर भी उसे नीचे गिरना पड़ता है, क्योंकि कालकी चाल ही ऐसी है॥ २६॥

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