श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एवं व्यवसितो राजन् सत्यसंकल्प ईश्‍वरः।

शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः॥ ५ ✎ 1211

evaṃ vyavasito rājan satyasaṃkalpa īśvaraḥ|

śāpavyājena viprāṇāṃ saṃjahre svakulaṃ vibhuḥ|| 5

अर्थ

राजन्! भगवान् सर्वशक्तिमान् और सत्यसंकल्प हैं। उन्होंने इस प्रकार अपने मनमें निश्‍चय करके ब्राह्मणोंके शापके बहाने अपने ही वंशका संहार कर डाला, सबको समेटकर अपने धाममें ले गये॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1211 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संजहृ → संजह्रे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें