श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुक्त्या लोचनं नृणाम्।

गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः॥ ६

svamūrtyā lokalāvaṇyanirmuktyā locanaṃ nṛṇām|

gīrbhistāḥ smaratāṃ cittaṃ padaistānīkṣatāṃ kriyāḥ|| 6

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌की वह मूर्ति त्रिलोकीके सौन्दर्यका तिरस्कार करनेवाली थी। उन्होंने अपनी सौन्दर्य-माधुरीसे सबके नेत्र अपनी ओर आकर्षित कर लिये थे। उनकी वाणी, उनके उपदेश परम मधुर, दिव्यातिदिव्य थे। उनके द्वारा उन्हें स्मरण करनेवालोंके चित्त उन्होंने छीन लिये थे। उनके चरणकमल त्रिलोक-सुन्दर थे। जिसने उनके एक चरण-चिह्नका भी दर्शन कर लिया, उसकी बहिर्मुखता दूर भाग गयी, वह कर्मप्रपंचसे ऊपर उठकर उन्हींकी सेवामें लग गया। उन्होंने अनायास ही पृथ्वीमें अपनी कीर्तिका विस्तार कर दिया, जिसका बड़े-बड़े सुकवियोंने बड़ी ही सुन्दर भाषामें वर्णन किया है। वह इसलिये कि मेरे चले जानेके बाद लोग मेरी इस कीर्तिका गान, श्रवण और स्मरण करके इस अज्ञानरूप अन्धकारसे सुगमतया पार हो जायँगे। इसके बाद परमैश्‍वर्यशाली भगवान् श्रीकृष्णने अपने धामको प्रयाण किया॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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