॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.90.7
विजहार विगाह्याम्भो ह्रदिनीषु महोदयः।✎ 1210
कुचकुंकुमलिप्तांगः परिरब्धश्च योषिताम्॥ ७
vijahāra vigāhyāmbho hradinīṣu mahodayaḥ|
kucakuṃkumaliptāṃgaḥ parirabdhaśca yoṣitām|| 7
अर्थ
सभी पत्नियोंके महलोंमें सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे। उनका निर्मल जल खिले हुए नीले, पीले, श्वेत, लाल आदि भाँति-भाँतिके कमलोंके परागसे मँहकता रहता था। उनमें झुंड-के-झुंड हंस, सारस आदि सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहकते रहते थे। भगवान् श्रीकृष्ण उन जलाशयोंमें तथा कभी-कभी नदियोंके जलमें भी प्रवेश कर अपनी पत्नियोंके साथ जल-विहार करते थे। भगवान्के साथ विहार करनेवाली पत्नियाँ जब उन्हें अपने भुजपाशमें बाँध लेतीं, आलिंगन करतीं, तब भगवान्के श्रीअंगोंमें उनके वक्षःस्थलकी केसर लग जाती थी॥ ६-७॥✎ 1447 1448