श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

न चलसि न वदस्युदारबुद्धे

क्षितिधर चिन्तयसे महान्तमर्थम्।

अपि बत वसुदेवनन्दनाङ्‌घ्रिं

वयमिव कामयसे स्तनैर्विधर्तुम्॥ २२

na calasi na vadasyudārabuddhe

kṣitidhara cintayase mahāntamartham|

api bata vasudevanandanāṅghriṃ

vayamiva kāmayase stanairvidhartum|| 22

अर्थ

प्रिय पर्वत! तुम तो बड़े उदार विचारके हो। तुमने ही पृथ्वीको भी धारण कर रखा है। न तुम हिलते-डोलते हो और न कुछ कहते-सुनते हो। जान पड़ता है कि किसी बड़ी बातकी चिन्तामें म‌ग्‍न हो रहे हो। ठीक है, ठीक है; हम समझ गयीं। तुम हमारी ही भाँति चाहते हो कि अपने स्तनोंके समान बहुत-से शिखरोंपर मैं भी भगवान् श्यामसुन्दरके चरण-कमल धारण करूँ॥ २२॥

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