॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.90.23
शुष्यद्ध्रदाः कर्शिता बत सिन्धुपत्न्यः
सम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इष्टभर्तुः।
यद्वद् वयं मधुपतेः प्रणयावलोक-
मप्राप्य मुष्टहृदयाः पुरुकर्शिताः स्म॥ २३
śuṣyaddhradāḥ karśitā bata sindhupatnyaḥ
sampratyapāstakamalaśriya iṣṭabhartuḥ|
yadvad vayaṃ madhupateḥ praṇayāvaloka-
maprāpya muṣṭahṛdayāḥ purukarśitāḥ sma|| 23
अर्थ
समुद्रपत्नी नदियो! यह ग्रीष्म ऋतु है। तुम्हारे कुण्ड सूख गये हैं। अब तुम्हारे अंदर खिले हुए कमलोंका सौन्दर्य नहीं दीखता। तुम बहुत दुबली-पतली हो गयी हो। जान पड़ता है, जैसे हम अपने प्रियतम श्यामसुन्दरकी प्रेमभरी चितवन न पाकर अपना हृदय खो बैठी हैं और अत्यन्त दुबली-पतली हो गयी हैं, वैसे ही तुम भी मेघोंके द्वारा अपने प्रियतम समुद्रका जल न पाकर ऐसी दीन-हीन हो गयी हो॥ २३॥✎ 898