श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

विप्रापत्यमचक्षाणस्तत ऐन्द्रीमगात् पुरीम्।

आ‌ग्‍नेयीं नैर्ऋतीं सौम्यां वायव्यां वारुणीमथ।✎ 1208 1209

रसातलं नाकपृष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुधः॥ ४४

viprāpatyamacakṣāṇastata aindrīmagāt purīm|

āgneyīṃ nair:ṛtīṃ saumyāṃ vāyavyāṃ vāruṇīmatha|

rasātalaṃ nākapṛṣṭhaṃ dhiṣṇyānyanyānyudāyudhaḥ|| 44

अर्थ

वहाँ उन्हें ब्राह्मणका बालक नहीं मिला। फिर वे शस्त्र लेकर क्रमशः इन्द्र, अग्‍नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदिकी पुरियोंमें, अतलादि नीचेके लोकोंमें, स्वर्गसे ऊपरके महर्लोकादिमें एवं अन्यान्य स्थानोंमें गये॥ ४४॥✎ 1445 1446

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1208 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्तीं → नैऋर्ऋतीं
  • #1209 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नैऋर्ऋतीं → नैर्ऋतीं
  • #1445 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1446 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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