मिथ्यावादी अर्जुनको धिक्कार है! अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले अर्जुनके धनुषको धिक्कार है!! इसकी दुर्बुद्धि तो देखो! यह मूढ़तावश उस बालकको लौटा लाना चाहता है, जिसे प्रारब्धने हमसे अलग कर दिया है’॥ ४२॥
धिगर्जुनं मृषावादं धिगात्मश्लाघिनो धनुः।
दैवोपसृष्टं यो मौढ्यादानिनीषति दुर्मतिः॥ ४२
मिथ्यावादी अर्जुनको धिक्कार है! अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले अर्जुनके धनुषको धिक्कार है!! इसकी दुर्बुद्धि तो देखो! यह मूढ़तावश उस बालकको लौटा लाना चाहता है, जिसे प्रारब्धने हमसे अलग कर दिया है’॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.89.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 697) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/89/42/