दानवराज! आप इतने बड़े होकर ऐसी छोटी-छोटी बातोंपर विश्वास कर लेते हैं? आप यदि अब भी उसे जगद्गुरु मानते हों और उसकी बातपर विश्वास करते हों तो झटपट अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा कर लीजिये॥ ३३॥
यदि वस्तत्र विश्रम्भो दानवेन्द्र जगद्गुरौ।
तर्ह्यंगाशु स्वशिरसि हस्तं न्यस्य प्रतीयताम्॥ ३३
दानवराज! आप इतने बड़े होकर ऐसी छोटी-छोटी बातोंपर विश्वास कर लेते हैं? आप यदि अब भी उसे जगद्गुरु मानते हों और उसकी बातपर विश्वास करते हों तो झटपट अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा कर लीजिये॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 692) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/33/