यो दक्षशापात् पैशाच्यं प्राप्तः प्रेतपिशाचराट्॥ ३२
evaṃ cettarhi tadvākyaṃ na vayaṃ śraddadhīmahi|
yo dakṣaśāpāt paiśācyaṃ prāptaḥ pretapiśācarāṭ|| 32
अर्थ
श्रीभगवान्ने कहा—‘अच्छा, ऐसी बात है? तब तो भाई! हम उसकी बातपर विश्वास नहीं करते। आप नहीं जानते हैं क्या? वह तो दक्ष प्रजापतिके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो गया है। आजकल वही प्रेतों और पिशाचोंका सम्राट् है॥ ३२॥
एवं चेत्तर्हि तद्वाक्यं न वयं श्रद्दधीमहि।
यो दक्षशापात् पैशाच्यं प्राप्तः प्रेतपिशाचराट्॥ ३२
श्रीभगवान्ने कहा—‘अच्छा, ऐसी बात है? तब तो भाई! हम उसकी बातपर विश्वास नहीं करते। आप नहीं जानते हैं क्या? वह तो दक्ष प्रजापतिके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो गया है। आजकल वही प्रेतों और पिशाचोंका सम्राट् है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 692) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/32/