श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं भगवता पृष्टो वचसामृतवर्षिणा।

गतक्लमोऽब्रवीत्तस्मै यथापूर्वमनुष्ठितम्॥ ३१

evaṃ bhagavatā pṛṣṭo vacasāmṛtavarṣiṇā|

gataklamo'bravīttasmai yathāpūrvamanuṣṭhitam|| 31

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के एक-एक शब्दसे अमृत बरस रहा था। उनके इस प्रकार पूछनेपर पहले तो उसने तनिक ठहरकर अपनी थकावट दूर की; उसके बाद क्रमशः अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा भगवान् शंकरके पीछे दौड़नेकी बात शुरूसे कह सुनायी॥ ३१॥

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