श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.88.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 88 · अथाष्टाशीतितमोऽध्यायः

यद्यसत्यं वचः शम्भोः कथंचिद् दानवर्षभ।

तदैनं जह्यसद्वाचं न यद् वक्तानृतं पुनः॥ ३४

yadyasatyaṃ vacaḥ śambhoḥ kathaṃcid dānavarṣabha|

tadainaṃ jahyasadvācaṃ na yad vaktānṛtaṃ punaḥ|| 34

अर्थ

दानव-शिरोमणे! यदि किसी प्रकार शंकरकी बात असत्य निकले तो उस असत्यवादीको मार डालिये, जिससे फिर कभी वह झूठ न बोल सके॥ ३४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें