श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

योऽवतीर्य यदोर्वंशे नृणां संसरतामिह।✎ 1202

यशो वितेने तच्छान्त्यै त्रैलोक्यवृजिनापहम्॥ ३४

yo'vatīrya yadorvaṃśe nṛṇāṃ saṃsaratāmiha|

yaśo vitene tacchāntyai trailokyavṛjināpaham|| 34

अर्थ

आपने यदुवंशमें अवतार लेकर जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े हुए मनुष्योंको उससे मुक्त करनेके लिये जगत‍्में ऐसे विशुद्ध यशका विस्तार किया है, जो त्रिलोकीके पाप-तापको शान्त करनेवाला है॥ ३४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1202 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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