आपने यदुवंशमें अवतार लेकर जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े हुए मनुष्योंको उससे मुक्त करनेके लिये जगत्में ऐसे विशुद्ध यशका विस्तार किया है, जो त्रिलोकीके पाप-तापको शान्त करनेवाला है॥ ३४॥
योऽवतीर्य यदोर्वंशे नृणां संसरतामिह।
यशो वितेने तच्छान्त्यै त्रैलोक्यवृजिनापहम्॥ ३४
आपने यदुवंशमें अवतार लेकर जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़े हुए मनुष्योंको उससे मुक्त करनेके लिये जगत्में ऐसे विशुद्ध यशका विस्तार किया है, जो त्रिलोकीके पाप-तापको शान्त करनेवाला है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.86.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 664) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/86/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1202 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां