श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

को नु त्वच्चरणाम्भोजमेवंविद् विसृजेत् पुमान्।

निष्किंचनानां शान्तानां मुनीनां यस्त्वमात्मदः॥ ३३

ko nu tvaccaraṇāmbhojamevaṃvid visṛjet pumān|

niṣkiṃcanānāṃ śāntānāṃ munīnāṃ yastvamātmadaḥ|| 33

अर्थ

भला, ऐसा कौन पुरुष है, जो आपकी इस परम दयालुता और प्रेमपरवशताको जानकर भी आपके चरणकमलोंका परित्याग कर सके? प्रभो! जिन्होंने जगत‍्की समस्त वस्तुओंका एवं शरीर आदिका भी मनसे परित्याग कर दिया है, उन परम शान्त मुनियोंको आप अपनेतकको भी दे डालते हैं॥ ३३॥

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