श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

आनर्तधन्वकुरुजांगलकंकमत्स्य-

पांचालकुन्तिमधुकेकयकोसलार्णाः।

अन्ये च तन्मुखसरोजमुदारहास-

स्निग्धेक्षणं नृप पपुर्दृशिभिर्नृनार्यः॥ २०

ānartadhanvakurujāṃgalakaṃkamatsya-

pāṃcālakuntimadhukekayakosalārṇāḥ|

anye ca tanmukhasarojamudārahāsa-

snigdhekṣaṇaṃ nṛpa papurdṛśibhirnṛnāryaḥ|| 20

अर्थ

परीक्षित्! उस यात्रामें आनर्त, धन्व, कुरुजांगल, कंक, मत्स्य, पांचाल, कुन्ति, मधु, केकय, कोसल, अर्ण आदि अनेक देशोंके नर-नारियोंने अपने नेत्ररूपी दोनोंसे भगवान् श्रीकृष्णके उन्मुक्त हास्य और प्रेमभरी चितवनसे युक्त मुखारविन्दके मकरन्द-रसका पान किया॥ २०॥

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