श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.86.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 86 · अथ षडशीतितमोऽध्यायः

तेभ्यः स्ववीक्षणविनष्टतमिस्रदृग्भ्यः

क्षेमं त्रिलोकगुरुरर्थदृशं च यच्छन्।

शृण्वन् दिगन्तधवलं स्वयशोऽशुभघ्नं

गीतं सुरैर्नृभिरगाच्छनकैर्विदेहान्॥ २१

tebhyaḥ svavīkṣaṇavinaṣṭatamisradṛgbhyaḥ

kṣemaṃ trilokagururarthadṛśaṃ ca yacchan|

śṛṇvan digantadhavalaṃ svayaśo'śubhaghnaṃ

gītaṃ surairnṛbhiragācchanakairvidehān|| 21

अर्थ

त्रिलोकगुरु भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे उन लोगोंकी अज्ञानदृष्टि नष्ट हो गयी। प्रभु-दर्शन करनेवाले नर-नारियोंको अपनी दृष्टिसे परम कल्याण और तत्त्वज्ञानका दान करते चल रहे थे। स्थान-स्थानपर मनुष्य और देवता भगवान्‌की उस कीर्तिका गान करके सुनाते, जो समस्त दिशाओंको उज्ज्वल बनानेवाली एवं समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण धीरे-धीरे विदेह देशमें पहुँचे॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें