प्रभो! यह शरीर मैं हूँ और इस शरीरके सम्बन्धी मेरे अपने हैं, इस अहंता एवं ममतारूप स्नेहकी फाँसीसे तुमने इस सारे जगत्को बाँध रखा है॥ १७॥
असावहं ममैवैते देहे चास्यान्वयादिषु।
स्नेहपाशैर्निबध्नाति भवान् सर्वमिदं जगत्॥ १७
प्रभो! यह शरीर मैं हूँ और इस शरीरके सम्बन्धी मेरे अपने हैं, इस अहंता एवं ममतारूप स्नेहकी फाँसीसे तुमने इस सारे जगत्को बाँध रखा है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 654) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/17/