श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

यदृच्छया नृतां प्राप्य सुकल्पामिह दुर्लभाम्।

स्वार्थे प्रमत्तस्य वयो गतं त्वन्माययेश्‍वर॥ १६

yadṛcchayā nṛtāṃ prāpya sukalpāmiha durlabhām|

svārthe pramattasya vayo gataṃ tvanmāyayeśvara|| 16

अर्थ

परमेश्‍वर! मुझे शुभ प्रारब्धके अनुसार इन्द्रियादिकी सामर्थ्यसे युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ। किन्तु तुम्हारी मायाके वश होकर मैं अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थसे ही असावधान हो गया और मेरी सारी आयु यों ही बीत गयी॥ १६॥

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