दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः॥ २७
patnīṃ vīkṣya visphurantīṃ devīṃ vaimānikīmiva|
dāsīnāṃ niṣkakaṇṭhīnāṃ madhye bhāntīṃ sa vismitaḥ|| 27
अर्थ
प्रिय परीक्षित्! ब्राह्मणपत्नी सोनेका हार पहनी हुई दासियोंके बीचमें विमानस्थित देवांगनाके समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये॥ २७॥
पत्नीं वीक्ष्य विस्फुरन्तीं देवीं वैमानिकीमिव।
दासीनां निष्ककण्ठीनां मध्ये भान्तीं स विस्मितः॥ २७
प्रिय परीक्षित्! ब्राह्मणपत्नी सोनेका हार पहनी हुई दासियोंके बीचमें विमानस्थित देवांगनाके समान अत्यन्त शोभायमान एवं देदीप्यमान हो रही थी। उसे इस रूपमें देखकर वे विस्मित हो गये॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.81.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 627) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/81/27/