श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.81.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · अथैकाशीतितमोऽध्यायः

पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा प्रेमोत्कण्ठाश्रुलोचना।

मीलिताक्ष्यनमद् बुद्ध्या मनसा परिषस्वजे॥ २६

pativratā patiṃ dṛṣṭvā premotkaṇṭhāśrulocanā|

mīlitākṣyanamad buddhyā manasā pariṣasvaje|| 26

अर्थ

पतिदेवको देखते ही पतिव्रता पत्‍नीके नेत्रोंमें प्रेम और उत्कण्ठाके आवेगसे आँसू छलक आये। उसने अपने नेत्र बंद कर लिये। ब्राह्मणीने बड़े प्रेमभावसे उन्हें नमस्कार किया और मन-ही-मन आलिंगन भी॥ २६॥

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