श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

यदृच्छयोपपन्‍नेन वर्तमानो गृहाश्रमी।

तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा॥ ७

yadṛcchayopapannena vartamāno gṛhāśramī|

tasya bhāryā kucailasya kṣutkṣāmā ca tathāvidhā|| 7

अर्थ

वे गृहस्थ होनेपर भी किसी प्रकारका संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसीमें सन्तुष्ट रहते थे। उनके वस्त्र तो फटे-पुराने थे ही, उनकी पत्‍नीके भी वैसे ही थे। वह भी अपने पतिके समान ही भूखसे दुबली हो रही थी॥ ७॥

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