श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

कृष्णस्यासीत् सखा कश्‍चिद् ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः।

विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः॥ ६

kṛṣṇasyāsīt sakhā kaścid brāhmaṇo brahmavittamaḥ|

virakta indriyārtheṣu praśāntātmā jitendriyaḥ|| 6

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्णके परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयोंसे विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे॥ ६॥

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