श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

इति संचिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे।

अप्यस्त्युपायनं किंचिद् गृहे कल्याणि दीयताम्॥ १३

iti saṃcintya manasā gamanāya matiṃ dadhe|

apyastyupāyanaṃ kiṃcid gṛhe kalyāṇi dīyatām|| 13

अर्थ

यही विचार करके उन्होंने जानेका निश्‍चय किया और अपनी पत्‍नीसे बोले—‘कल्याणी! घरमें कुछ भेंट देनेयोग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’॥ १३॥

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