श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कस्मान्मृदमदान्तात्मन् भवान् भक्षितवान् रहः।

वदन्ति तावका ह्येते कुमारास्तेऽग्रजोऽप्ययम्॥ ३४

kasmānmṛdamadāntātman bhavān bhakṣitavān rahaḥ|

vadanti tāvakā hyete kumārāste'grajo'pyayam|| 34

अर्थ

‘क्यों रे नटखट! तू बहुत ढीठ हो गया है। तूने अकेलेमें छिपकर मिट्टी क्यों खायी? देख तो तेरे दलके तेरे सखा क्या कह रहे हैं! तेरे बड़े भैया बलदाऊ भी तो उन्हींकी ओरसे गवाही दे रहे हैं’॥ ३४॥✎ 1404 1405 1406 1407 2238 2239

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1404 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): थींण्। → थीं।
  • #1405 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लियाञ्। → लिया।
  • #1406 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कहा—‘माँ! → कहा—‘मा!
  • #1407 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँ → मा
  • #2238 टिप्पणी: → यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
  • #2239 टिप्पणी: → भगवान्‌के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे। 

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