हितैषिणी यशोदाने श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया†। उस समय श्रीकृष्णकी आँखें डरके मारे नाच रही थीं‡। यशोदा मैयाने डाँटकर कहा—॥ ३३॥✎ 140414051406140722382239
सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी।
यशोदा भयसम्भ्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत॥ ३३
हितैषिणी यशोदाने श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया। उस समय श्रीकृष्णकी आँखें डरके मारे नाच रही थीं। यशोदा मैयाने डाँटकर कहा—॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 178) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/33/
टिप्पणियाँ
†
यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
(मुद्रित पृष्ठ 178)
‡
भगवान्के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे।
(मुद्रित पृष्ठ 178)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#1404 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): थींण्। → थीं।
#1405 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लियाञ्। → लिया।
#1406 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कहा—‘माँ! → कहा—‘मा!
#2238 टिप्पणी: → यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
#2239 टिप्पणी: → भगवान्के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे।