श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारकाः।

कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन्॥ ३२

ekadā krīḍamānāste rāmādyā gopadārakāḥ|

kṛṣṇo mṛdaṃ bhakṣitavāniti mātre nyavedayan|| 32

अर्थ

एक दिन बलराम आदि ग्वालबाल श्रीकृष्णके साथ खेल रहे थे। उन लोगोंने मा यशोदाके पास आकर कहा—‘मा! कन्हैयाने मिट्टी खायी है’*॥ ३२॥✎ 1404 1405 1406 1407 2238 2239

टिप्पणियाँ

  1. *

    मृद्-भक्षणके हेतु—

    १—भगवान् श्रीकृष्णने विचार किया कि मुझमें शुद्ध सत्त्वगुण ही रहता है और आगे बहुत-से रजोगुणी कर्म करने हैं। उसके लिये थोड़ा-सा ‘रज’ संग्रह कर लें।

    २—संस्कृत-साहित्यमें पृथ्वीका एक नाम ‘क्षमा’ भी है। श्रीकृष्णने देखा कि ग्वालबाल खुलकर मेरे साथ खेलते हैं; कभी-कभी अपमान भी कर बैठते हैं। उनके साथ क्षमांश धारण करके ही क्रीडा करनी चाहिये, जिससे कोई विघ्न न पड़े।

    ३—संस्कृत-भाषामें पृथ्वीको ‘रसा’ भी कहते हैं। श्रीकृष्णने सोचा सब रस तो ले ही चुका हूँ, अब रसा-रसका आस्वादन करूँ।

    ४—इस अवतारमें पृथ्वीका हित करना है। इसलिये उसका कुछ अंश अपने मुख्य (मुखमें स्थित) द्विजों (दाँतों) को पहले दान कर लेना चाहिये।

    ५—ब्राह्मण शुद्ध सात्त्विक कर्ममें लग रहे हैं, अब उन्हें असुरोंका संहार करनेके लिये कुछ राजस कर्म भी करने चाहिये। यही सूचित करनेके लिये मानो उन्होंने अपने मुखमें स्थित द्विजोंको (दाँतोंको) रजसे युक्त किया।

    ६—पहले विष भक्षण किया था, मिट्टी खाकर उसकी दवा की।

    ७—पहले गोपियोंका मक्खन खाया था, उलाहना देनेपर मिट्टी खा ली, जिससे मुँह साफ हो जाय।

    ८—भगवान् श्रीकृष्णके उदरमें रहनेवाले कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके जीव व्रज-रज—गोपियोंके चरणोंकी रज— प्राप्त करनेके लिये व्याकुल हो रहे थे। उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये भगवान्‌ने मिट्टी खायी।

    ९—भगवान् स्वयं ही अपने भक्तोंकी चरण-रज मुखके द्वारा अपने हृदयमें धारण करते हैं।

    १०—छोटे बालक स्वभावसे ही मिट्टी खा लिया करते हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 178)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1404 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): थींण्। → थीं।
  • #1405 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लियाञ्। → लिया।
  • #1406 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कहा—‘माँ! → कहा—‘मा!
  • #1407 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँ → मा
  • #2238 टिप्पणी: → यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
  • #2239 टिप्पणी: → भगवान्‌के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे। 

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