श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

तमागतमभिप्रेत्य मुनयो दीर्घसत्रिणः।

अभिनन्द्य यथान्यायं प्रणम्योत्थाय चार्चयन्॥ २१

tamāgatamabhipretya munayo dīrghasatriṇaḥ|

abhinandya yathānyāyaṃ praṇamyotthāya cārcayan|| 21

अर्थ

दीर्घकालतक सत्संगसत्रका नियम लेकर बैठे हुए ऋषियोंने बलरामजीको आया देख अपने-अपने आसनोंसे उठकर उनका स्वागत-सत्कार किया और यथायोग्य प्रणाम-आशीर्वाद करके उनकी पूजा की॥ २१॥

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