॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.78.18
स्नात्वा प्रभासे सन्तर्प्य देवर्षिपितृमानवान्।
सरस्वतीं प्रतिस्रोतं ययौ ब्राह्मणसंवृतः॥ १८
snātvā prabhāse santarpya devarṣipitṛmānavān|
sarasvatīṃ pratisrotaṃ yayau brāhmaṇasaṃvṛtaḥ|| 18
अर्थ
वहाँसे चलकर उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें स्नान किया और तर्पण तथा ब्राह्मणभोजनके द्वारा देवता, ऋषि, पितर और मनुष्योंको तृप्त किया। इसके बाद वे कुछ ब्राह्मणोंके साथ जिधरसे सरस्वती नदी आ रही थी, उधर ही चल पड़े॥ १८॥