श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

न वै तेऽजित भक्तानां ममाहमिति माधव।

त्वं तवेति च नानाधीः पशूनामिव वैकृता॥ ५

na vai te'jita bhaktānāṃ mamāhamiti mādhava|

tvaṃ taveti ca nānādhīḥ paśūnāmiva vaikṛtā|| 5

अर्थ

किसीसे पराजित न होनेवाले माधव! ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है तथा यह तू है और यह तेरा’—इस प्रकारकी विकारयुक्त भेदबुद्धि तो पशुओंकी होती है। जो आपके अनन्य भक्त हैं, उनके चित्तमें ऐसे पागलपनके विचार कभी नहीं आते। फिर आपमें तो होंगे ही कहाँसे? (इसलिये आप जो कुछ कर रहे हैं, वह लीला-ही-लीला है)॥ ५॥✎ 1439

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1439 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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