श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.72.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 72 · अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः

शत्रोर्जन्ममृती विद्वान् जीवितं च जराकृतम्।

पार्थमाप्याययन् स्वेन तेजसाचिन्तयद्धरिः॥ ४२

śatrorjanmamṛtī vidvān jīvitaṃ ca jarākṛtam|

pārthamāpyāyayan svena tejasācintayaddhariḥ|| 42

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण जरासन्धके जन्म और मृत्युका रहस्य जानते थे और यह भी जानते थे कि जरा राक्षसीने जरासन्धके शरीरके दो टुकड़ोंको जोड़कर इसे जीवन-दान दिया है। इसलिये उन्होंने भीमसेनके शरीरमें अपनी शक्तिका संचार किया और जरासन्धके वधका उपाय सोचा॥ ४२॥

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