॥ श्रीहरिः ॥
संचिन्त्यारिवधोपायं भीमस्यामोघदर्शनः।
दर्शयामास विटपं पाटयन्निव संज्ञया॥ ४३
saṃcintyārivadhopāyaṃ bhīmasyāmoghadarśanaḥ|
darśayāmāsa viṭapaṃ pāṭayanniva saṃjñayā|| 43
अर्थ
परीक्षित्! भगवान्का ज्ञान अबाध है। अब उन्होंने उसकी मृत्युका उपाय जानकर एक वृक्षकी डालीको बीचोबीचसे चीर दिया और इशारेसे भीमसेनको दिखाया॥ ४३॥
संचिन्त्यारिवधोपायं भीमस्यामोघदर्शनः।
दर्शयामास विटपं पाटयन्निव संज्ञया॥ ४३
परीक्षित्! भगवान्का ज्ञान अबाध है। अब उन्होंने उसकी मृत्युका उपाय जानकर एक वृक्षकी डालीको बीचोबीचसे चीर दिया और इशारेसे भीमसेनको दिखाया॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 586) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/72/43/