भ्रातॄन् दिग्विजयेऽयुङ्क्त विष्णुतेजोपबृंहितान्॥ १२
niśamya bhagavadgītaṃ prītaḥ phullamukhāmbujaḥ|
bhrātṝn digvijaye'yuṅkta viṣṇutejopabṛṃhitān|| 12
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिरका हृदय आनन्दसे भर गया। उनका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया। अब उन्होंने अपने भाइयोंको दिग्विजय करनेका आदेश दिया। भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंमें अपनी शक्तिका संचार करके उनको अत्यन्त प्रभावशाली बना दिया था॥ १२॥
निशम्य भगवद्गीतं प्रीतः फुल्लमुखाम्बुजः।
भ्रातॄन् दिग्विजयेऽयुङ्क्त विष्णुतेजोपबृंहितान्॥ १२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिरका हृदय आनन्दसे भर गया। उनका मुखकमल प्रफुल्लित हो गया। अब उन्होंने अपने भाइयोंको दिग्विजय करनेका आदेश दिया। भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंमें अपनी शक्तिका संचार करके उनको अत्यन्त प्रभावशाली बना दिया था॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.72.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 582) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/72/12/