श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन् प्रपन्‍नभयभंजन।

वयं त्वां शरणं यामो भवभीताः पृथग्धियः॥ २५

kṛṣṇa kṛṣṇāprameyātman prapannabhayabhaṃjana|

vayaṃ tvāṃ śaraṇaṃ yāmo bhavabhītāḥ pṛthagdhiyaḥ|| 25

अर्थ

‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप मन और वाणीके अगोचर हैं। जो आपकी शरणमें आता है, उसके सारे भय आप नष्ट कर देते हैं। प्रभो! हमारी भेद-बुद्धि मिटी नहीं है। हम जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं॥ २५॥✎ 1707

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1707 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भाव → निष्कामभाव

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