‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप मन और वाणीके अगोचर हैं। जो आपकी शरणमें आता है, उसके सारे भय आप नष्ट कर देते हैं। प्रभो! हमारी भेद-बुद्धि मिटी नहीं है। हम जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं॥ २५॥✎ 1707
कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन् प्रपन्नभयभंजन।
वयं त्वां शरणं यामो भवभीताः पृथग्धियः॥ २५
‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आप मन और वाणीके अगोचर हैं। जो आपकी शरणमें आता है, उसके सारे भय आप नष्ट कर देते हैं। प्रभो! हमारी भेद-बुद्धि मिटी नहीं है। हम जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करसे भयभीत होकर आपकी शरणमें आये हैं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 569) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)