श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः

कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे।

यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां

सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै॥ २६

loko vikarmanirataḥ kuśale pramattaḥ

karmaṇyayaṃ tvadudite bhavadarcane sve|

yastāvadasya balavāniha jīvitāśāṃ

sadyaśchinattyanimiṣāya namo'stu tasmai|| 26

अर्थ

भगवन्! अधिकांश जीव ऐसे सकाम और निषिद्ध कर्मोंमें फँसे हुए हैं कि वे आपके बतलाये हुए अपने परम कल्याणकारी कर्म, आपकी उपासनासे विमुख हो गये हैं और अपने जीवन एवं जीवनसम्बन्धी आशा-अभिलाषाओंमें भ्रम-भटक रहे हैं। परन्तु आप बड़े बलवान् हैं। आप कालरूपसे सदा-सर्वदा सावधान रहकर उनकी आशालताका तुरंत समूल उच्छेद कर डालते हैं। हम आपके उस कालरूपको नमस्कार करते हैं॥ २६॥✎ 1707

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1707 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भाव → निष्कामभाव

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