॥ श्रीहरिः ॥
तत्राहुर्ब्राह्मणाः केचिदासीना ब्रह्मवादिनः।✎ 1185
पूर्वेषां पुण्ययशसां राज्ञां चाकथयन् कथाः॥ २१
tatrāhurbrāhmaṇāḥ kecidāsīnā brahmavādinaḥ|
pūrveṣāṃ puṇyayaśasāṃ rājñāṃ cākathayan kathāḥ|| 21
अर्थ
कोई-कोई व्याख्याकुशल ब्राह्मण वहाँ बैठकर वेदमन्त्रोंकी व्याख्या करते और कोई पूर्वकालीन पवित्रकीर्ति नरपतियोंके चरित्र कह-कहकर सुनाते॥ २१॥
तत्राहुर्ब्राह्मणाः केचिदासीना ब्रह्मवादिनः।
पूर्वेषां पुण्ययशसां राज्ञां चाकथयन् कथाः॥ २१
कोई-कोई व्याख्याकुशल ब्राह्मण वहाँ बैठकर वेदमन्त्रोंकी व्याख्या करते और कोई पूर्वकालीन पवित्रकीर्ति नरपतियोंके चरित्र कह-कहकर सुनाते॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 569) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1185 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तत्राहुर्ब्ह्मणा: → तत्राहुर्ब्राह्मणाः