श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

क्वापि सन्ध्यामुपासीनं जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम्।

एकत्र चासिचर्मभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु॥ २५

kvāpi sandhyāmupāsīnaṃ japantaṃ brahma vāgyatam|

ekatra cāsicarmabhyāṃ carantamasivartmasu|| 25

अर्थ

कहीं सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्रीका जप कर रहे हैं। कहीं हाथोंमें ढाल-तलवार लेकर उनको चलानेके पैतरे बदल रहे हैं॥ २५॥✎ 1705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1705 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-कुण्डोंमें → यज्ञकुण्डोंमें

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