श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

जुह्वन्तं च विताना‌ग्‍नीन् यजन्तं पञ्चभिर्मखैः।

भोजयन्तं द्विजान् क्वापि भुञ्जानमवशेषितम्॥ २४

juhvantaṃ ca vitānāgnīn yajantaṃ pañcabhirmakhaiḥ|

bhojayantaṃ dvijān kvāpi bhuñjānamavaśeṣitam|| 24

अर्थ

(इसी प्रकार देवर्षि नारदने विभिन्‍न महलोंमें भगवान्‌को भिन्‍न-भिन्‍न कार्य करते देखा।) कहीं वे यज्ञकुण्डोंमें हवन कर रहे हैं तो कहीं पंचमहायज्ञोंसे देवता आदिकी आराधना कर रहे हैं। कहीं ब्राह्मणोंको भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञका अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं॥ २४॥✎ 1705

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1705 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: यज्ञ-कुण्डोंमें → यज्ञकुण्डोंमें

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