‘अहो, यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! सचमुच कालकी चालको कोई टाल नहीं सकता। तभी तो आज पैरोंकी जूती उस सिरपर चढ़ना चाहती है, जो श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित है॥ २४॥✎ 1703
अहो महच्चित्रमिदं कालगत्या दुरत्यया।
आरुरुक्षत्युपानद् वै शिरो मुकुटसेवितम्॥ २४
‘अहो, यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! सचमुच कालकी चालको कोई टाल नहीं सकता। तभी तो आज पैरोंकी जूती उस सिरपर चढ़ना चाहती है, जो श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)