श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

अहो महच्चित्रमिदं कालगत्या दुरत्यया।

आरुरुक्षत्युपानद् वै शिरो मुकुटसेवितम्॥ २४

aho mahaccitramidaṃ kālagatyā duratyayā|

ārurukṣatyupānad vai śiro mukuṭasevitam|| 24

अर्थ

‘अहो, यह तो बड़े आश्‍चर्यकी बात है! सचमुच कालकी चालको कोई टाल नहीं सकता। तभी तो आज पैरोंकी जूती उस सिरपर चढ़ना चाहती है, जो श्रेष्ठ मुकुटसे सुशोभित है॥ २४॥✎ 1703

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1703 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तिल-मिला → तिलमिला

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