श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

तमाभिचारदहनमायान्तं द्वारकौकसः।

विलोक्य तत्रसुः सर्वे वनदाहे मृगा यथा॥ ३५

tamābhicāradahanamāyāntaṃ dvārakaukasaḥ|

vilokya tatrasuḥ sarve vanadāhe mṛgā yathā|| 35

अर्थ

उस अभिचारकी आगको बिलकुल पास आयी हुई देख द्वारकावासी वैसे ही डर गये, जैसे जंगलमें आग लगनेपर हरिन डर जाते हैं॥ ३५॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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