ताड़के पेड़के समान बड़ी-बड़ी टाँगें थीं। वह अपने वेगसे धरतीको कँपाता हुआ और ज्वालाओंसे दसों दिशाओंको दग्ध करता हुआ द्वारकाकी ओर दौड़ा और बात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे॥ ३४॥✎ 8931953
पद्भ्यां तालप्रमाणाभ्यां कम्पयन्नवनीतलम्।
सोऽभ्यधावद् वृतो भूतैर्द्वारकां प्रदहन् दिशः॥ ३४
ताड़के पेड़के समान बड़ी-बड़ी टाँगें थीं। वह अपने वेगसे धरतीको कँपाता हुआ और ज्वालाओंसे दसों दिशाओंको दग्ध करता हुआ द्वारकाकी ओर दौड़ा और बात-की-बातमें द्वारकाके पास जा पहुँचा। उसके साथ बहुत-से भूत भी थे॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 549) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)