श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.66.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 66 · अथ षट्षष्टितमोऽध्यायः

अक्षैः सभायां क्रीडन्तं भगवन्तं भयातुराः।

त्राहि त्राहि त्रिलोकेश वह्नेः प्रदहतः पुरम्॥ ३६

akṣaiḥ sabhāyāṃ krīḍantaṃ bhagavantaṃ bhayāturāḥ|

trāhi trāhi trilokeśa vahneḥ pradahataḥ puram|| 36

अर्थ

वे लोग भयभीत होकर भगवान्‌के पास दौड़े हुए आये; भगवान् उस समय सभामें चौसर खेल रहे थे, उन लोगोंने भगवान्‌से प्रार्थना की—‘तीनों लोकोंके एकमात्र स्वामी! द्वारका नगरी इस आगसे भस्म होना चाहती है। आप हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा इसकी रक्षा और कोई नहीं कर सकता’॥ ३६॥✎ 893 1953

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #893 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1953 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ऊऋण → उऋण

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