॥ श्रीहरिः ॥
भवन्तावनुगृह्णीतां किंकरस्याविजानतः।
समुद्धरत मां कृच्छ्रात् पतन्तं निरयेऽशुचौ॥ २०
bhavantāvanugṛhṇītāṃ kiṃkarasyāvijānataḥ|
samuddharata māṃ kṛcchrāt patantaṃ niraye'śucau|| 20
अर्थ
मैं आपलोगोंका सेवक हूँ। मुझसे अनजानमें यह अपराध बन गया है। मुझपर आपलोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्टसे तथा घोर नरकमें गिरनेसे बचा लीजिये’॥ २०॥
भवन्तावनुगृह्णीतां किंकरस्याविजानतः।
समुद्धरत मां कृच्छ्रात् पतन्तं निरयेऽशुचौ॥ २०
मैं आपलोगोंका सेवक हूँ। मुझसे अनजानमें यह अपराध बन गया है। मुझपर आपलोग कृपा कीजिये और मुझे इस घोर कष्टसे तथा घोर नरकमें गिरनेसे बचा लीजिये’॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/20/