nāhaṃ pratīcche vai rājannityuktvā svāmyapākramat|
nānyad gavāmapyayutamicchāmītyaparo yayau|| 21
अर्थ
‘राजन्! मैं इसके बदलेमें कुछ नहीं लूँगा।’ यह कहकर गायका स्वामी चला गया। ‘तुम इसके बदलेमें एक लाख ही नहीं, दस हजार गौएँ और दो तो भी मैं लेनेका नहीं।’ इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया॥ २१॥
नाहं प्रतीच्छे वै राजन्नित्युक्त्वा स्वाम्यपाक्रमत्।
नान्यद् गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ॥ २१
‘राजन्! मैं इसके बदलेमें कुछ नहीं लूँगा।’ यह कहकर गायका स्वामी चला गया। ‘तुम इसके बदलेमें एक लाख ही नहीं, दस हजार गौएँ और दो तो भी मैं लेनेका नहीं।’ इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 539) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/21/