प्रह्रादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वयः॥ ४७✎ 1184
avadhyo'yaṃ mamāpyeṣa vairocanisuto'suraḥ|
prahrādāya varo datto na vadhyo me tavānvayaḥ|| 47
अर्थ
मैं जानता हूँ कि बाणासुर दैत्यराज बलिका पुत्र है। इसलिये मैं भी इसका वध नहीं कर सकता; क्योंकि मैंने प्रह्लादको वर दे दिया है कि मैं तुम्हारे वंशमें पैदा होनेवाले किसी भी दैत्यका वध नहीं करूँगा॥ ४७॥
अवध्योऽयं ममाप्येष वैरोचनिसुतोऽसुरः।
प्रह्रादाय वरो दत्तो न वध्यो मे तवान्वयः॥ ४७
मैं जानता हूँ कि बाणासुर दैत्यराज बलिका पुत्र है। इसलिये मैं भी इसका वध नहीं कर सकता; क्योंकि मैंने प्रह्लादको वर दे दिया है कि मैं तुम्हारे वंशमें पैदा होनेवाले किसी भी दैत्यका वध नहीं करूँगा॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.63.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 535) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/63/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1184 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रहृदाय → प्रह्रादाय