॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.62.35
तं नागपाशैर्बलिनन्दनो बली
घ्नन्तं स्वसैन्यं कुपितो बबन्ध ह।
ऊषा भृशं शोकविषादविह्वला
बद्धं निशम्याश्रुकलाक्ष्यरौदिषीत्॥ ३५
taṃ nāgapāśairbalinandano balī
ghnantaṃ svasainyaṃ kupito babandha ha|
ūṣā bhṛśaṃ śokaviṣādavihvalā
baddhaṃ niśamyāśrukalākṣyaraudiṣīt|| 35
अर्थ
जब बली बाणासुरने देखा कि यह तो मेरी सारी सेनाका संहार कर रहा है, तब वह क्रोधसे तिलमिला उठा और उसने नागपाशसे उन्हें बाँध लिया। ऊषाने जब सुना कि उसके प्रियतमको बाँध लिया गया है, तब वह अत्यन्त शोक और विषादसे विह्वल हो गयी; उसके नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहने लगी, वह रोने लगी॥ ३५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे
ऽनिरुद्धबन्धो नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥✎ 1819